Furr
संवाद
Ahk vahl.
तुम आए।
हम्म... अजनबी।
Nar'kesh.
मैं... फ़र्र। मियोवियन।
प्राचीन भाषा बोलता हूँ... तुम्हारे शब्द कठिन हैं।
मैं... वैज्ञानिक हूँ। द्वारों का अध्ययन करता हूँ।
कुछ में से एक... क्वालाट का निवासी।
खोजता हूँ क्यों द्वार खुलते हैं... क्यों तुम आते हो।
घर की रक्षा करना... बाहरी लोगों से।
द्वार... वे संतुलन बिगाड़ते हैं।
हर तारा... एक भूली हुई कहानी।
पूर्वज फुसफुसाते हैं... लेकिन शब्द मिटते जाते हैं।
तुम क्यों आते हो... दुख क्यों लाते हो?
आकाश भारी लगता है... बदलाव का तूफ़ान।
घर... वैसा नहीं है जैसा पहले था।
घर की यादें... अब राख हो गई हैं।
रेगिस्तान की हवाएँ... आवाज़ें लाती हैं।
पूर्वज देखते हैं... उनकी नज़र भारी है।
मौन बोलता है... अगर तुम सुनो।
अब से पहले तुमने क्यों नहीं सुना?
नहीं... नार'केश। कोई भरोसा नहीं।
तुम्हारी मदद... मैं अस्वीकार करता हूँ।
तुम अराजकता लाते हो... हमें इसकी ज़रूरत नहीं।
तुमसे डर... विश्वासघात आता है।
बाहरी लोगों से... कोई सहायता नहीं।
मैं... अकेले संभाल लूँगा। जाओ।
तुम्हारे जैसे... पीड़ा लाते हैं। नहीं।
हम जीवित रहेंगे... तुम्हारे बिना।
तुम... फ़र्र की मदद करोगे?
बहुत समय... औरों की ज़रूरत है।
डर ने घेरा है... पर तुम्हारी ज़रूरत है।
हाँ... मदद चाहिए... कृपया।
खतरा पास है... क्या तुम सहायता करोगे?
मैं... डरता हूँ... लेकिन तुम पर भरोसा करता हूँ।