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खंडहर

खंडहर

ये खंडहर गहन निस्तब्धता में डूबे हैं; इनके ढहते पत्थर की दीवारों पर समय और अँधेरे के दाग हैं। समय से भूले हुए चढ़ावे की तरह खोपड़ियाँ ज़मीन पर बिखरी हुई हैं, जबकि बीच में जलती अकेली अलाव की आग धुँधली रौशनी डालती है, जिसमें धुँधले हो चुके मंत्रचिह्न और जले हुए अनुष्ठानिक अवशेष दिखते हैं।

पत्थर में लगे मुँडेरों से पीने के पात्र लटकते हैं, जो हवा के गुज़रते ही आपस में टकराकर धीमी खनक पैदा करते हैं। अफ़वाहें कहती हैं कि कभी कोई पंथी दूर के दलदलों से यहाँ काले अनुष्ठान कराने आया था। पर इससे भी अधिक अजीब है उस अनोखे दाँत के डॉक्टर की कहानी, जो अब यहाँ आता-जाता रहता है—शांत भाव से जीवों और इंसानों के दाँत निकालकर उनका ब्यौरा रखता है, दावा करता है कि हर दाँत में कोई न कोई याददाश्त मौजूद है जिसे सहेजने लायक समझा जाना चाहिए।